What is the difference between the Ayurvedic diet and other diets?






  1. The Ayurvedic art of cooking (Annayoga) is to prepare food which is delicious, yet satisfying and most importantly that which gives maximum energy with minimum efforts.
  2. Snack food which is mostly quite spiced-up or deep-fried satisfy the sense of taste but don’t give the required nourishment as it is not transformed up to the seventh body tissue (Dhatu) which is the vital energy in the body.
  3. Ayurveda recommends that we eat sattvic food which can be easily transformed into Shukra (vitality). Satvic food is tasty, easy to digest and helps to have clear bowels every day, which is very important since 99% of diseases are caused by low digestive fire.
  4. Ayurveda gives many recommendations on how to remain healthy with the right diet.
  5. There are certain substances which are highly sattvic and are easily transformed into Ojas (the subtle energy) required most by the heart and the brain, for example, milk, sugar, almonds, butter, ghee and special substances like saffron, gold, and silver.
  6. Thus the tradition of eating in silver thalis in India or in European countries where the royal teacups are always lined with pure gold at the rims.
  7.  Milk is particularly important in the daily diet — it is Poorna anna, which means it is a complete food.
  8. The milk which Ayurveda talks about is naturally from the original breed of cows like Gir or Kankrej with the hump on their backs, now popular as the A2 milk.
  9. Those who have difficulty digesting milk can boil it with a piece of dry ginger (Suntha). Fresh milk is the best and one should at least avoid long shelf-life milk which is unnaturally preserved.
  10. Ayurveda also suggests to boil the drinking water for a minimum of twenty minutes so as to make it light for digestion and to drink it always hot or warm or at the most cooled to room temperature.
  11. Water can also be further cultured with gold and herbs like Chandan (sandalwood), Wala (vetiver), Manjishta (Rubia cordifolia), etc, the mixture is available as a Jala-Santulan powder, so that it is easily accepted by the digestive system and which keeps the digestive fire (Agni) in a balanced state.
  12. The main meal of the day should provide all the six Rasas or tastes i.e. Madhur (sweet), amla (sour), Lavan (salty), Tikta (bitter), Katu (pungent) and kashaya (astringent). A good example of a complete meal which includes all Rasas is our Indian thali with rice, dal, chapati, vegetable, salad, and buttermilk. Such food gives real satisfaction for the body, mind, and soul. It gives one a healthy, glowing and energetic appearance, and also promotes peace of mind and a positive outlook towards life.
  13. Another important consideration is to eat according to your constitution.
  14. Ayurveda broadly describes three constitutions i.e. Vata dominated, pitta dominated and Kapha dominated. So, for example, excess chilies or fried stuff is not good for the pitta person or eating dry food like Chiwda or capsicum is not advised for the Vata constitution, similarly heavy milk sweets or cheese are best avoided by the Kapha person.
  15. The age-old adage, “You are what you eat” is really true and it is important not to neglect one’s diet in the rush of daily living.
  16. This is why Ayurveda gives so much importance to a healthy and balanced diet. Once the basic concepts of the Ayurvedic lifestyle have been understood, the diet can be adapted to suit different climates and constitutions.

The author is the founder of Atmasantulana Village, a world-renowned holistic healing center. 
WRITTEN BYShreeguru Dr Balaji TambeSOURCE
 DNA 

            










आयुर्वेदिक आहार और अन्य आहारों में क्या अंतर है?

  1. खाना पकाने की आयुर्वेदिक कला (अन्नयोग) ऐसा भोजन तैयार करना है, जो स्वादिष्ट है, फिर भी संतोषजनक है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो न्यूनतम प्रयासों के साथ अधिकतम उर्जा देता है
  2. जंक फूड जो ज्यादातर मसालेदार या गहरे तले हुए होते हैं, स्वाद की भावना को संतुष्ट करते हैं लेकिन आवश्यक पोषण नहीं देते हैं क्योंकि यह सातवें शरीर के ऊतक (धातू) में परिवर्तित नहीं होता है जो कि शरीर में महत्वपूर्ण ऊर्जा है
  3. आयुर्वेद की सलाह है कि हम सात्विक भोजन करें जिसे आसानी से शुक्र धातू (जीवन शक्ति) में बदला जा सकता है। सात्विक भोजन स्वादिष्ट होता है, पचने में आसान होता है और हर दिन पेट साफ  होने में मदद करता है, जो कि बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि 99% रोग कम पाचन अग्नि के कारण होते हैं।
  4. सही खानपान के साथ स्वस्थ कैसे रहें, इस बारे में आयुर्वेद कई सलाह देता है।
  5. कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जो अत्यधिक सात्विक होते हैं और आसानी से ओजस (सूक्ष्म ऊर्जा) में परिवर्तित हो जाते हैं, जो हृदय और मस्तिष्क द्वारा सबसे अधिक आवश्यक होते हैं, उदाहरण के लिए, दूध, चीनी, बादाम, मक्खन, घी और विशेष पदार्थ जैसे केसर, सोना, चांदी, इ.
  6. इस प्रकार भारत में चांदी की थालियों में खाने की परंपरा है या यूरोपीय देशों में जहाँ शाही चाय को हमेशा शुद्ध सोने के किनारे वाले कप में परोसा जाता है।
  7. दैनिक आहार में दूध विशेष रूप से महत्वपूर्ण है - यह पूर्ण अन्न है
  8. आयुर्वेद जिस दूध की बात करता है, वह स्वाभाविक रूप से गायों की मूल नस्ल जैसे गिर या कंकरेज का होता है , जो अब A2 दूध के रूप में लोकप्रिय है।
  9. जिन लोगों को दूध पचाने में कठिनाई होती है, वे इसे सूखे अदरक (सोंठ) के टुकड़े के साथ उबाल सकते हैं। ताजा दूध सबसे अच्छा है और आप को लंबे समय तक रखे हुये दूध से बचना चाहिए जो कि अस्वाभाविक रूप से रखा है।
  10. आयुर्वेद भी पीने के पानी को कम से कम बीस मिनट तक उबालने का सुझाव देता है ताकि पाचन के लिए इसे हल्का बनाया जा सके और इसे हमेशा उष्ण, गर्म या कमरे के तापमान पर ठंडा किया हुंआ पिना चाहिये
  11. पानी को सोने और जड़ी-बूटियों जैसे चंदन, वाला, मंजिष्ठ, आदि के साथ भी सुसंस्कृत किया जा सकता है, यह मिश्रण एक जल-सन्तुलन पाउडर के रूप में उपलब्ध है। जो पाचन तंत्र और पाचन अग्नि को संतुलित अवस्था में रखता है।
  12. दिन के मुख्य भोजन में सभी छह रस या स्वाद यानी मधुर, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा और कषाय लेना चाहिए। संपूर्ण भोजन का एक अच्छा उदाहरण जिसमें चावल, दाल, चपाती, सब्जी, सलाद और छाछ के साथ हमारी भारतीय थाली शामिल है। ऐसा भोजन शरीर, मन और आत्मा के लिए वास्तविक संतुष्टि देता है। यह एक स्वस्थ, चमक और ऊर्जावान उपस्थिति देता है, और मन की शांति और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को भी बढ़ावा देता है।
  13. एक और महत्वपूर्ण विचार: खाना हमेशा  अपने शरीर के रचना के अनुसार खाना है 
  14.   आयुर्वेद मोटे तौर पर शरीर के तीन प्रकृती का वर्णन करता है:  वात का प्रभुत्व, पित्त का प्रभुत्व और का प्रभुत्व। उदाहरण के लिए, अतिरिक्त मिर्च या तली हुई चीजें पित्त व्यक्ति के लिए अच्छी नहीं हैं| चिवड़ा या शिमला मिर्च जैसे सूखे भोजन खाने की सलाह वात प्रकृतीके व्यक्ती को नहीं दी जाती है, इसी तरह भारी दूध वाली मिठाई या पनीर से फवाले व्यक्ति को बचना चाहिये
  15.  सदियों पुरानी कहावत, "तुम वही बनते हो जैसा तुम खाते हो" वास्तव में सच है और दैनिक जीवन की दौड़ में किसी को भी आहार की उपेक्षा नहीं करना चाहिये है।
  16.  यही कारण है कि आयुर्वेद स्वस्थ और संतुलित आहार को इतना महत्व देता है। एक बार जब आयुर्वेदिक जीवनशैली की मूल अवधारणाओं को समझ लिया गया, तो आहार को विभिन्न मौसम और संरचनाओं के अनुकूल बनाया जा सकता है।

लेखक आत्मसंतुलन गाँव के संस्थापक हैं, जो एक विश्व प्रसिद्ध समग्र चिकित्सा केंद्र है।

श्रीगुरु डॉ बालाजी तांबे द्वारा लिखित





स्रोत

डीएनए



HEALTH DISCLAIMER


This blog provides general information and discussions about health and related subjects. The information and other content provided in this blog, or in any linked materials, are not intended and should not be construed as medical advice, nor is the information a substitute for professional medical expertise or treatment. If you or any other person has a medical concern, you should consult with your health care provider or seek other professional medical treatment. Never disregard professional medical advice or delay in seeking it because of something that has read on this blog or in any linked materials. If you think you may have a medical emergency, call your doctor or emergency services immediately.


0 Comments